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। दोहा । ।
श्री
गुरु चरण सरोज रज, निज मन
मुकुरु सुधारि ।
बरनऊ
रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि । ।
बुद्धिहीन
तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।
बल
बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु
कलेस विकार । ।
अर्थ
– तुलसीदास जी, श्री हनुमान का स्मरण करते हुए कहते हैं कि श्री गुरू महाराज के कमल
रुपी चरण के रज(धूल) से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके में श्री रघुवीर जी के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों प्रकार के फल (धर्म, अर्थ, काम
और मोक्ष) देने वाला है। हे, पवन कुमार ! मैं स्वयं को बुद्धिहीन मानकर सम्पूर्ण
मनोयोग से आपको सुमिरन (स्मरण) करता हूँ। मुझे
शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं विद्या
प्रदान करें और मेरे समस्त दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।
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। चौपाई । ।
जय
हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश
तिहुँ लोक उजागर ।
रामदूत
अतुलित बलधामा, अंजनि - पुत्र पवनसुत
नामा । ।
अर्थ
- हनुमान जी, आपकी सदा जय हो। आपका ज्ञान और गुण के अथाह सागर हैं। आप कपिश
अर्थात् कपियों (वानरों) के देवता हैं । हे वानरराज, तीनों लोकों (स्वर्गलोक, भूलोक, पाताल
लोक) में आपकी कीर्ति है। श्री राम जी के दूत आप अतुलनीय बलशाली हैं । आपको माता अंजनी
के पुत्र तथा पवनदेव के पुत्र के नाम से जाना जाता है ।
। । चौपाई । ।
महावीर
विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के
संगी ।
कंचन
बरन बिराज सुवेसा, कानन
कुण्डल कुंचित केसा । ।
अर्थ – हे
बजरंगबली ! आप महावीर हैं तथा विक्रम अर्थात् विशेष पराक्रम वाले हैं । आप कुमति (दुर्बुद्धि)
को दूर कर सुमति (सद्बुद्धि) प्रदान करने वाले हैं, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी
हैं। आपका रंग सोने के वर्ण का है तथा आप सुन्दर वस्त्रों के धारक हैं, आप कानों में
कुण्डल तथा घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।